अग्नि पुराण - एक सौ चौवनवाँ अध्याय ! Agni Purana - 154 Chapter !
अग्नि पुराण एक सौ चौवनवाँ अध्याय विवाहविषयक बातें !
अग्नि पुराण - एक सौ चौवनवाँ अध्याय ! Agni Purana - 154 Chapter ! |
अग्नि पुराण - एक सौ चौवनवाँ अध्याय !
पुष्कर उवाच |विप्रश्चतस्रो विन्देत भार्यास्तिस्रस्तु भूमिपः !
दवे च वैश्यो यथाकामं भार्यैकामपि चान्त्यजः || 1 ||
धर्मकार्याणि सर्वाणि न कार्यन्यासावर्णय !
पाणिग्रह्यः सवार्नासु गृहिणीयात्क्षत्रिय शरणं || 2 ||
वैश्य प्रतिदमादद्यददशं वै चान्त्यज तथा !
सकृतकन्या प्रदातव्या हरणस्तं कौरदण्डभाक् || 3 ||
अपत्यविक्रयासक्ते निष्कृतिर्न विधीयते !
कन्यादानं शचियोगो विवाहोऽथा चतुर्थिका || 4 ||
विवाहमेतत्कथितम् नामकर्मचतुष्टयम् !
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ || 5 ||
पञ्चस्वपात्सु नारीणां पतिरान्यो विध्यते !
मृते तु देवरे देयत्तदाभवे यथेच्चया || 6 ||
पूर्वात्रितयामग्नेयं वायव्यं कोटात्रयं !
रोहिणौ चेति चरणे भगनाः शस्यते सदा || 7 ||
नैकागोत्रन्तु वारयेन्नैकार्षेयञ्च भार्गव !
पितृत: सप्तमादुरध्वं मातृतः पंचमत्था || 8 ||
अहुय दानं ब्रह्मः स्यात्कुलशीलयुताय तु !
पुरुषान्स्तारयेत्तज्जो नित्यं कन्याप्रदानतः || 9 ||
तथा गोमिथुनादानाद्विवहस्तवर्ष उच्यते !
प्रार्थिता दीयते यस्य प्रजापत्यः स धर्मकृत || 10 ||
शुलकेण कासुरो मण्डो गन्धर्वो वरानन्मिथः !
राक्षसो युद्धहरणात्पैशाचः कन्याकाचलात् || 11 ||
वैवाहिकेऽह्नि कुर्विता कुम्भकरमृदा शुचिम् !
जलाशाये तु तं पूज्य वद्यैः स्त्रीं गृहत्रयेत् || 12 ||
प्रशुप्ते केशवे नैव विवाहः कार्य एव हि !
पोशे चैत्रे कुजादिने रिक्ताविष्टिथो न च || 13 ||
न शुक्रजीवेऽस्तमिते न शशांके गृहर्दिते !
अरकारकाभौमयक्ते भे व्यतिपातहते न हि || 14 ||
सोम्यं पितृयांच वायव्यं सावित्रं रोहिणि तथा !
उत्तरात्रितयं मूलं मैत्रं पौषं विवाहं || 15 ||
मनुषाख्यस्तथा लग्नो मनुषाख्यंशकः शुभः !
तृतिये च तथा षष्ठे दशमैकादशेऽष्टमे || 16 ||
अरकारिकचंदतनयः प्रशस्त न कुजोऽष्टमः !
सप्तन्त्यष्टमवर्गेषु शेषः शास्ता ग्रहोत्तमः || 17 ||
तेषामपि तथा मध्यात्षष्ठः शुक्रो न शस्यते !
वैवाहिके भे कर्त्तव्य तथैव च चतुर्थिका || 18 ||
न दातव्य ग्रहास्त्र चतुराद्यास्तथैकगाः !
पर्ववर्जं स्त्रीं गच्छेत्सत्य दत्त सदा रतिः || 19 ||
अग्नि पुराण - एक सौ चौवनवाँ अध्याय !-हिन्दी मे -Agni Purana - 154 Chapter!-In Hindi
पुष्कर कहते हैं- परशुरामजी ! ब्राह्मण अपनी कामनाके अनुसार चारों वर्णोंकी कन्याओंसे विवाह कर सकता है, क्षत्रिय तीनसे, वैश्य दोसे तथा शूद्र एक ही स्त्रीसे विवाहका अधिकारी है। जो अपने समान वर्णकी न हो, ऐसी स्त्रीके साथ किसी भी धार्मिक कृत्यका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये। अपने समान वर्णकी कन्याओंसे विवाह करते समय पतिको उनका हाथ पकड़ना चाहिये। यदि क्षत्रिय कन्याका विवाह ब्राह्मणसे होता हो तो वह ब्राह्मणके हाथमें हाथ न देकर उसके द्वारा पकड़े हुए बाणका अग्रभाग अपने हाथसे पकड़े। इसी प्रकार वैश्य-कन्या यदि ब्राह्मण अथवा क्षत्रियसे ब्याही जाती हो तो वह वरके हाथमें रखा हुआ चाबुक पकड़े और शूद्र-कन्या वस्त्रका छोर ग्रहण करे। एक ही बार कन्याका दान देना चाहिये। जो उसका अपहरण करता है, वह चोरके समान दण्ड पानेका अधिकारी है॥ १-३॥
जो संतान बेचनेमें आसक्त हो जाता है, उसका पापसे कभी उद्धार नहीं होता। कन्यादान, शचीयोग (शचीकी पूजा), विवाह और चतुर्थीकर्म- इन चार कर्मोंका नाम 'विवाह' है। (मनोनीत) पतिके लापता होने, मरने तथा संन्यासी, नपुंसक और पतित होनेपर इन पाँच प्रकारकी आपत्तियोंके समय (वाग्दत्ता) स्त्रियोंके लिये दूसरा पति करनेका विधान है। पतिके मरनेपर देवरको कन्या देनी चाहिये। वह न हो तो किसी दूसरेको इच्छानुसार देनी चाहिये। वर अथवा कन्याका वरण करनेके लिये तीनों पूर्वा, कृत्तिका, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी- ये नक्षत्र सदा शुभ माने गये हैं॥ ४-७॥
परशुराम ! अपने समान गोत्र तथा समान प्रवरमें उत्पन्न हुई कन्याका वरण न करे। पितासे ऊपरकी सात पीढ़ियोंके पहले तथा मातासे पाँच पीढ़ियोंके बादकी ही परम्परामें उसका जन्म होना चाहिये। उत्तम कुल तथा अच्छे स्वभावके सदाचारी वरको घरपर बुलाकर उसे कन्याका दान देना 'ब्राह्मविवाह' कहलाता है। उससे उत्पन्न हुआ बालक उक्त कन्यादानजनित पुण्यके प्रभावसे अपने पूर्वजोंका सदाके लिये उद्धार कर देता है। वरसे एक गाय और एक बैल लेकर जो कन्यादान किया जाता है, उसे 'आर्ष-विवाह' कहते हैं। जब किसीके माँगनेपर उसे कन्या दी जाती है तो वह 'प्राजापत्य-विवाह' कहलाता है; इससे धर्मकी सिद्धि होती है। कीमत लेकर कन्या देना 'आसुर-विवाह' है; यह नीच श्रेणीका कृत्य है। वर और कन्या जब स्वेच्छापूर्वक एक-दूसरेको स्वीकार करते हैं तो उसे 'गान्धर्व- विवाह' कहते हैं। युद्धके द्वारा कन्याके हर लेनेसे 'राक्षस-विवाह' कहलाता है तथा कन्याको धोखा देकर उड़ा लेना 'पैशाच-विवाह' माना गया है ॥। ८-११ ॥
विवाहके दिन कुम्हारकी मिट्टीसे शचीकी प्रतिमा बनाये और जलाशयके तटपर उसकी गाजे-बाजेके साथ पूजा कराकर कन्याको घर ले जाना चाहिये। आषाढ़से कार्तिकतक, जब भगवान् विष्णु शयन करते हों, विवाह नहीं करना चाहिये। पौष और चैत्रमासमें भी विवाह निषिद्ध है। मङ्गलके दिन तथा रिक्ता एवं भद्रा तिथियोंमें भी विवाह मना है। जब बृहस्पति और शुक्र अस्त हों, चन्द्रमापर ग्रहण लगनेवाला हो, लग्न- स्थानमें सूर्य, शनैश्वर तथा मङ्गल हों और व्यतीपात दोष आ पड़ा हो तो उस समय भी विवाह नहीं करना चाहिये। मृगशिरा, मघा, स्वाती, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, मूल, अनुराधा तथा रेवती- ये विवाहके नक्षत्र हैं॥ १२-१५॥
पुरुषवाची लग्न तथा उसका नवमांश शुभ होता है। लग्नसे तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें तथा आठवें स्थानमें सूर्य, शनैश्चर और बुध हों तो शुभ है। आठवें स्थानमें मङ्गलका होना अशुभ है। शेष ग्रह सातवें, बारहवें तथा आठवें घरमें हों तो शुभकारक होते हैं। इनमें भी छठे स्थानका शुक्र उत्तम नहीं होता। चतुर्थी- कर्म भी वैवाहिक नक्षत्रमें ही करना चाहिये। उसमें लग्न तथा चौथे आदि स्थानोंमें ग्रह न रहें तो उत्तम है। पर्वका दिन छोड़कर अन्य समयमें ही स्त्री-समागम करे। इससे सती (या शची) देवीके आशीर्वादसे सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है॥ १६-१९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विवाहभेद-कथन' नामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४॥
टिप्पणियाँ