विष्णु पुराण अध्याय 3 संस्कृत और हिंदी में - Vishnu Puran Chapter 3 in Sanskrit and Hindi
तीसरा अध्याय - ब्रह्मादि की आयु और काल का स्वरूप !निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः ।
कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ १
शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः ।
यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ।
भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता ॥ २
तन्निबोध यथा सर्गे भगवान्सम्प्रवर्त्तते ।
नारायणाख्यो भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ३
उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन्नित्यमेवोपचारतः ॥ ४
निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम् ।
तत्पराख्यं तदर्द्ध च परार्द्धमभिधीयते ॥ ५
कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ । हे भगवन्! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है उसका सर्गादिका कर्ता होना कैसे सिद्ध हो सकता है? श्री पराशरजी बोले- हे तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेय ! समस्त भाव-पदार्थोकी शक्तियाँ अचिन्त्य-ज्ञानकी विषय होती हैं; [उनमें कोई युक्ति काम नहीं देती] अतः अग्निकी शक्ति उष्णताके समान ब्रह्मकी भी सर्गादि-रचना रूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं अब जिस प्रकार नारायण नामक लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी सृष्टिकी रचनामें प्रवृत्त होते हैं सो सुनो। हे विद्वन् ! वे सदा उपचारसे ही 'उत्पन्न हुए' कहलाते हैं उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी कही जाती है। उस (सौ वर्ष) का नाम पर है, उसका आधा परार्द्ध कहलाता है ॥ १-५॥
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विष्णु पुराण अध्याय 3 - Vishnu Purana Chapter 3 |
तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम् ॥ ६
अन्येषां चैव जन्तूनां चराणामचराश्च ये।
भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम ॥ ७
काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम।
काष्ठा त्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्तिको विधिः ॥ ८
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूत्तैर्मानुषं स्मृतम् ।
अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ॥ ९
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम् ॥ १०
दिव्यैर्वर्षसहस्त्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् ।
हे अनघ ! मैंने जो तुमसे विष्णुभगवान्का कालस्वरूप कहा था उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी तथा और भी जो पृथिवी, पर्वत, समुद्र आदि चराचर जीव हैं उनकी आयुका परिमाण किया जाता है हे मुनिश्रेष्ठ ! पन्द्रह निमेषको काष्ठा कहते हैं, तीस काष्ठाकी एक कला तथा तीस कलाका एक मुहूर्त होता है तीस मुहूर्तका मनुष्यका एक दिन-रात कहा जाता है और उतने ही दिन-रातका दो पक्षयुक्त एक मास होता है छः महीनोंका एक अयन और दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन मिलकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन ॥ ६ - १० ॥
चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे ॥ ११
चत्वारि त्रीणि द्वै चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् ।
दिव्याब्दानां सहस्त्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः ॥ १२
तत्प्रमाणैः शतैः सन्ध्या पूर्वा तत्राभिधीयते ।
सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः ॥ १३
सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम ।
युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः ॥ १४
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम् ।
प्रोच्यते तत्सहस्त्रं च ब्रह्मणो दिवसं मुने । १५
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवस्तु चतुर्दश ।
देवताओंके बारह हजार वर्षोंके सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग नामक चार युग होते हैं। उनका अलग-अलग परिमाण मैं तुम्हें सुनाता हूँ पुरातत्त्वके जाननेवाले सतयुग आदिका परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष बतलाते हैं प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ वर्षकी सन्ध्या बतायी जाती है और युगके पीछे उतने ही परिमाण वाले सन्ध्यांश होते हैं [अर्थात् सतयुग आदिके पूर्व क्रमशः चार, तीन, दो और एक सौ दिव्य वर्षकी सन्ध्याएँ और इतने ही वर्षके सन्ध्यांश होते हैं] हे मुनिश्रेष्ठ ! इन सन्ध्या और सन्ध्यांशोंके बीचका जितना काल होता है, उसे ही सतयुग आदि नामवाले युग जानना चाहिये हे मुने ! सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि ये मिलकर चतुर्युग कहलाते हैं; ऐसे हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है ॥ ११ - १५ ॥
भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु ॥ १६
सप्तर्षयः सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवो नृपाः ।
एककाले हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत् ॥ १७
चतुर्युगाणां संख्याता साधिका होकसप्ततिः ।
मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनां च सत्तम ॥ १८
अष्टौ शत सहस्त्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतम् ।
द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्त्राण्यधिकानि तु ॥ १९
त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज ।
सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतानि महामुने ।॥ २०
विंशतिस्तु सहस्त्राणि कालोऽयमधिकं विना ।
हे ब्रह्मन् ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनो सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु और मनुके पुत्र राजालोग [पूर्वकल्पानुसार] एक ही कालमें रचे जाते हैं और एक ही कालमें उनका संहार किया जाता है
हे सत्तम! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है। यही मनु और देवता आदिका काल है इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनासे एक मन्वन्तरमें आठ लाख बावन हजार वर्ष बताये जाते हैं तथा हे महामुने। मानवी वर्ष-गणनाके अनुसार मन्वन्तरका परिमाण पूरे तीस करोड़ सरसठ लाख बीस हजार वर्ष है, इससे अधिक नहीं ॥ १६ - २०॥
मन्वन्तरस्य सङ्ख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१
चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्ममहः स्मृतम् ।
ब्राह्यो नैमित्तिको नाम तस्यान्ते प्रतिसञ्चरः ॥ २२
तदा हि दह्यते सर्वं त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम् ।
जनं प्रयान्ति तापार्ता महर्लोकनिवासिनः ॥ २३
एकार्णवे तु त्रैलोक्ये ब्रह्मा नारायणात्मकः ।
भोगिशय्यां गतः शेते त्रैलोक्यग्रासबृंहितः ॥ २४
जनस्थैर्योगिभिर्देवश्चिन्त्यमानोऽब्जसम्भवः ।
तत्प्रमाणां हि तां रात्रिं तदन्ते सृजते पुनः ॥ २५
एवं तु ब्रह्मणो वर्षमेवं वर्षशतं च यत्।
शतं हि तस्य वर्षाणां परमायुर्महात्मनः ॥ २६
एकमस्य व्यतीतं तु परार्द्धं ब्रह्मणोऽनघ।
तस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः ।। २७
द्वितीयस्य परार्द्धस्य वर्तमानस्य वै द्विज ।
वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकीर्तितः ॥ २८
इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका दिन होता है, इसके अनन्तर नैमित्तिक नामवाला ब्राह्म-प्रलय होता है उस समय भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक तीनों जलने लगते हैं और महलोंकमें रहनेवाले सिद्धगण अति सन्तप्त होकर जनलो क को चले जाते हैं इस प्रकार त्रिलोकीके जलमय हो जानेपर जनलोकवासी योगियोंद्वारा ध्यान किये जाते हुए नारायणरूप कमलयोनि ब्रह्माजी त्रिलोकीके ग्राससे तृप्त होकर दिनके बराबर ही परिमाणवाली उस रात्रिमें शेषशय्यापर शयन करते हैं और उसके बीत जानेपर पुनः संसारकी सृष्टि करते हैं इसी प्रकार (पक्ष, मास आदि) गणनासे ब्रह्माका एक वर्ष और फिर सौ वर्ष होते हैं। ब्रह्माके सौ वर्ष ही उस महात्मा (ब्रह्मा) की परमायु हैं हे अनघ ! उन ब्रह्माजीका एक परार्द्ध बीत चुका है। उसके अन्तमें पाद्म नामसे विख्यात महाकल्प हुआ था हे द्विज! इस समय वर्तमान उनके दूसरे परार्द्धका यह वाराह नामक पहला कल्प कहा गया है॥२२ - २८ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
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